Kabir Das Ke Dohe in Hindi | कबीर के प्रसिद्द दोहो का अर्थ

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Kabir Das Ke Dohe in Hindi

Kabir Das Ji is a very famous poet in Hindi if you Find Kabir ke dohe then you have come right page. On this page, we are given More Top Kabir Das Ke Dohe in Hindi which given us below. So continue to read our article and Enjoy with Kabir Ji ke dohe.


जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस संसार का यही नियम है कि जो उदय हुआ वो अस्त भी  होगा। जो विकसित हुआ है वो मुरझाएगा भी । जो चिना गया है वह गिरेगा भी और जो आया है वह एक दिन जाएगा भी


संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की सज्जन आदमी को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने अच्छे और भले स्वभाव को कभी नहीं छोड़ता। वैसे ही चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते है पर फिर भी वो अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता


पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात।
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जिस तरह पानी के बुलबुले है उसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षण भंगुर है और जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही एक मनुष्य का शरीर भी एक दिन नष्ट हो जायेगा|


कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस।
ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस।

कबीर दास जी कहते है की हे मानव तुझे किस बात गर्व है | काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। तुम्हे मालूम नहीं, वो कब तुझे घर या परदेश में मार डाले।


जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई।
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जब मनुष्य के गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है। पर जब उसी गुण को कोई गाहक नहीं मिलता, तब वो गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।


कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की समुद्र की तेज लहर से समुद्र में मोती आकर बिखर गए। परन्तु बगुला उनका भेद नहीं जानता, लेकिन हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। कबीर जी का कहना है की किसी भी वस्तु का महत्व सिर्फ और सिर्फ उस वस्तु का जानकार ही जानता है।


कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस संसार में आकर मैं अपने जीवन में बस यही चाहता हूँ कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी इंसान से दोस्ती नहीं तो किसी से दुश्मनी भी न हो !


अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जैसे बहुत अधिक वर्षा अच्छी नहीं और ना ही बहुत अधिक धूप अच्छी है। वैसे ही ना तो अधिक बोलना अच्छा है और ना ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ठीक है।


बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की वाणी एक अमूल्य रत्न है यह बात सिर्फ वो ही इंसान जानता है जो सही तरीके से बोलना जानता है । इसलिए वह अपनी वाणी को ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है वैसे ही लगातार प्रयत्न करने वाला इंसान भी ज़िन्दगी में कुछ न कुछ पा लेता है| लेकिन कुछ इंसान डूबने के डर से ही किनारे पर ही बैठा रह जाता है और वो कुछ भी नहीं पाता|


दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की मनुष्य का यही स्वभाव है कि जब वो दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते और उन दोषो का न आदि है न अंत।


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की कभी भी सज्जन आदमी से उसकी जाति ना पूछनी चाहिए उस से उसके ज्ञान को समझना चाहिए। उसी तरह तलवार के मयान का कोई मूल्य नहीं होता है मोल हमेशा तलवार का होता है| 


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े के पानी से एक साथ सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा! उसी प्रकार इंसान को मन में हमेशा धीरज रखना चाहिए क्योंकी धीरज से सब कुछ होता है।


तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जब कोई तिनका तुम्हारे पांवों तले दब जाता है तो कभी उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकी जब वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो बहुत तकलीफ पहुंचाता है| उसी प्रकार कभी किसी छोटे इंसान को कमज़ोर नहीं समझना नहीं चाहिए क्योंकी एक समय वो भी हमे तकलीफ पहुंचा सकता है|


कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस संसार के व्यक्ति का शरीर पक्षी रूपी हो गया है जो उसके मन में चलता है उसका शरीर भी उड़कर वहीं पहुँच जाता है उस प्रकार जो इंसान जैसा करता है उसे वैसा ही फल मिलता है|


जैसा भोजन खाइये , तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जो इंसान जैसा भोजन करता है वैसा ही उसका मन हो जाता है और हम जैसा पानी पीते है वैसी ही हमारी वाणी हो जाती है।


कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इंसान के मूँह से निकले बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है।


कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इंसान को हमेशा उस धन को इकट्ठा करना चाहिए जो भविष्य में काम आए। वरना किसी इंसान को सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा। 


साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की कोई भी साधू धन का भूखा नहीं होता वो हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता और जो साधू धन का भूखा होता है वह साधू नहीं हो सकता।


माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस संसार में रहते हुए इंसान की माया और मन कभी नहीं मरता लेकिन शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती|


मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की पानी से घी निकल आए तो रूखी रोटी कोई न खाएगा अथार्थ  इंसान को अपने मन की इच्छाओं के पीछे कभी नहीं भागना नहीं चाहिए क्योंकी वो उसे कभी पूरा नहीं कर पायेगा| 


दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय
जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इंसान सुख में कभी भगवान को याद नहीं करता लेकिन दुःख में सभी भगवान से प्रार्थना करते है। कबीर जी कहते है की अगर सुख में भगवान को याद किया जाये तो दुःख क्यों होगा।


जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की अगर इंसान का मन साफ़ है और उसका स्वभाव शीतल है तो इस संसार में उसका कोई दुश्मन नहीं हो सकता। कबीर जी कहते है की अगर हम अहंकार करना छोड़ दें तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है। 


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की मैं जब इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे इस संसार में कोई बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा इस संसार में कोई नहीं है।


साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हे प्रभु आप मुझे केवल इतना दो कि जिसमें मेरे और मेरे परिवार का गुजरा चल जाये। ना तो मैं भूखा रहूँ और ना ही मेरे अतिथि भूखे वापस जाए।


 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हे इंसान जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो। क्योंकी हमारा यह जीवन बहुत छोटा होता है अगर पल भर में समाप्त हो गया तो क्या करोगे।


माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की मिट्टी कुम्हार से कहती है कि हे कुम्हार आज तु मुझे रौंद रहे हो, पर एक दिन ऐसा भी आयेगा की तुम भी मिट्टी में मिल जाओगे और मैं तुम्हें रौंदूंगी!


कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस दुनिया में जो इंसान दूसरों की पीड़ा को समझता है वही सच्चा इंसान होता है अगर कोई इंसान जो दूसरों के कष्ट को ही नहीं समझ पाता वो इंसान भला किस काम का|


पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का जो पढ़े सो पंडित होय ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इंसान सिर्फ मोटी-मोटी किताबें पढ़ने से ज्ञानी नहीं बनता । जो इंसान प्रेम शब्द का ढाई अक्षर पढ़ लिया और समझ लिया वही सच्चा विद्वान बना है|


नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए ।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की मछली हमेशा पानी में ही रहती है पर फिर भी उसे कितना भी धोइए उसकी बदबू कभी नहीं जाती । उसी प्रकार कबीर कहते है की इंसान का नहाने से क्या फ़ायदा अगर उसके मन का मैल ही नहीं गया तो|


तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय ।
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हम सभी लोग हर रोज़ अपने शरीर को साफ़ करते हैं लेकिन बहुत कम लोग मन को साफ़ करते हैं । जो इंसान अपने मन को साफ़ करता है वो इंसान ही हर मायने में सच्चा इंसान बन पाता है


जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर।
जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हे कल्याण इच्छुक ! तू उस भ्रम में कभी मत बंध जिस भ्रम तथा मोह की रस्सी से जगत के जीव बंधे है ।जिस प्रकार नमक के बिना आटा फीका हो जाता है। उसी प्रकार सोने के समान तुम्हारा शरीर भजन बिना व्यर्थ जा रहा हैं।


गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे| कबीर दास जी कहते है की हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए क्योंकी गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है|


सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज ।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की अगर मैं इस पूरी धरती के रूपी एक बड़ा कागज बनाऊं और दुनियां के सभी वृक्षों की कलम बना लूँ और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है।


यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हमारा यह जो शरीर है वो विष से भरा हुआ है और गुणों रूपी गुरु अमृत की खान हैं। कबीर कहते है की अगर अपना शीशसर देने के बदले में मुझे कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी मेरे लिए बहुत सस्ता है।


ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हमे ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। कबीर जी कहते है की ऐसी वाणी दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।


बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की खजूर का पेड़ बहुत बड़ा होता है लेकिन ना तो वो किसी को छाया देता है और उसके भी फल भी बहुत दूरऊँचाई पे लगता है। कबीर जी कहते है की इसी तरह अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे तो ऐसे बड़े होने से भी कोई फायदा नहीं है।


चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये ।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की चक्की के पाटों के बीच में देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चलती चक्की में कुछ साबुत नहीं बचता।


ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है कबीर जी कहते है की ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।


जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप ।
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जहाँ दया होती वही धर्म होता है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ सिर्फ और सिर्फ ईश्वर का वास होता है।


निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिक पास रखना चाहिए क्योंकी वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है। जिस से हम हमारी कमिया जान कर उसे दूर कर सकते है 


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता वैसे ही यह मानव शरीर हमे उसी तरह बार-बार नहीं मिलता|


प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए ।
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए ।

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की प्रेम कहीं बाजार में बिकता है और ना ही प्रेम कहीं खेतों में उगाया जा सकता है। जिसको प्रेम चाहिए उसे अपने क्रोध, काम, इच्छा, भय त्यागना होगा।


लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट ।
पाछे फिर पछ्ताओगे,प्राण जाहि जब छूट  |

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की हे इंसान अभी राम नाम की लूट मची है अभी तुम भगवान का जितना नाम लेना चाहो ले लो नहीं तो समय निकल जाने पर, अर्थात मृत्यु हो जाने के बाद पछताओगे कि मैंने तब राम नाम की पूजा क्यों नहीं की|


पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत |

कबीर दास जी के इस दोहे का भावार्थ यह हैं की जो स्त्री मन से पवित्र होती है ना यदि वो तन से मैली भी हो भी ना तो भी अच्छी है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो फिर भी वह अपनी सब सहेलियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है|


 

Rahul Prajapati Areal news

Hi, I am Rahul Prajapati Author of the Arealnews.com. I am passionate about Blogging & Digital Marketing.  I have 3Years expressions of Blogging and Digital Marketing

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